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Wednesday, 7 March 2012

अध्यात्म !!!!!

दुर्गम पथ -तम में आजा
ए मेरे चिर अविनाशी
जैसे की सुने नभ में
आती है पूरनमासी ।।

निद्रित पलकों में करती
प्रतिदिन तेरा आहवाहन
फिर भी निष्ठुर प्रिय मेरे
समझे न जरा अपनापन ।।

ब्याकुल मन से उत्पीडित
है मेरे हिर्दय के छाले
 मधुरिम मानस स्मिरिती में 
ब्यथा के भड़के शोले ।।


आते हो पल भर को तुम
मादक सुख स्वप्न विखेरे
फिर इंतजार की घड़ियाँ
गुथते आँखों के घेरे ।।

अस्तित्व मेरे कैसा है
अनभिज्ञ रहे तुम इससे
चपला असीम गर्जन हो
बदली छाई हो जैसे ।।

तूफान गूजता उर में
बेदना विरह उद्देलित
यह  प्रिय विद्रोह की बेला
विक्षोभ विरह आप्लावित ।।



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