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Wednesday, 7 March 2012

कर्म !!!!!

कर्म-पाश में बधे हुए हैं, प्राणी जग के सारे ।
विजय सभी से प्राप्त किया, और अपने से हारे ।।

भव बंधन के संचालन को, ऐसा रचा विधाता ।
झूझ रहा अज्ञान तिमिर में, प्राणी समझ न पाता ।।

प्रारब्ध रहा जिसका जैसा, वैसे बनकर हम आते ।
किसी के हिस्से फूल हैं मिलते तो किसी को मिलते कांटे ।।

क्यूँ कोई सम्पूर्ण हुआ है,कोई हुआ अधुरा ।
कोई जग को रोशन करता, किसी को ग्रसित अँधेरा ।।

कोई तो मर्मज्ञ हुआ है,किसी की बुद्धि  अविकसित ।
किसी की वाणी में पटुता है,कर न सके कोई संबोधित ।।

कोई मालामाल  हुआ है,कोई हुआ कंगाल ।
कोई रोटी को तरसे तो सजे किसी के  थाल ।।

कोई बधिर दृष्ठीन  है कोई लंगड़ा लूला ।
जैसी करनी वैसी भरनी  ये है प्रभु की लीला ।।

नियत कर्म से चुक गए तो भवसागर में डूब गए ।
लहरों में थपेड़े खायेंगे और दूर किनारे छूटेंगे  ।।

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